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Ghazal By Kavi Deepak Sharma
Posted On 11/29/2008 09:56:57 by Kavi Deepak Sharma
दिल में जब तक मैं-तू नहीं हम हैं
घर बिखरने के मौके बहुत कम हैं ।

कौन खींचेगा भला सेहन में दीवार
प्यार जिंदा हो तो फिर कैसा गम है ।

जिस्म की छोडिये बिकने लगी औलादे
तरक्की की राह में यह कैसा ख़म है ।

खामियां आज उसकी खूबियाँ हो गई
जेब चाक़ थीं पहले अब खूब दम है ।

कतरने चन्द बन गईं औरत का लिबास
तहजीब शर्मिंदा है,शर्म के घर मातम है ।

ज़ख्म फिर से सभी जवान होने लगे
बता चारागर तेरा ये कैसा मरहम हैं ।

माँ की हंसी संग देखा एक हँसता बच्चा
वाह अल्लाह कितनी सुरीली सरगम हैं ।

खेलिए वक़्त से मत खेलने दीजिये इसे
वक़्त का खेल दोस्त बहुत बे- रहम हैं ।

चैन-ओ-अमन से जीना ईद के मायने
ज़िन्दगी रोकर बसर करना मोहर्रम है ।

हाथ फेला के संवारेगा वतन का मुक्कद्दर
उनको यकीन है पर हमें उम्मीद कम है ।

राम ही जाने अब सफ़र का अंजाम "दीपक"
टूटती साँसे रहनुमा की और तबियत नम है ।

Kavi Deepak Sharma
http://www.kavideepaksharma.co.in
All right reserved with @Kavi Deepak Sharma

Tags: Kuch Ghazal Kuch Nazm



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